Noor
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Noor / क़ुरआन / अद-दुख़ान
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अद-दुख़ान — धुआँ

الدُّخَانِ
मक्की आयत 59
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सुनें · Mishary Rashid Alafasy

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

अल्लाह के नाम से जो रहमान व रहीम है।

आयत 1

حمٓ

Haa Meeem

हा मीम

आयत 2

وَٱلْكِتَٰبِ ٱلْمُبِينِ

Wal Kitaabil Mubeen

वाज़ेए व रौशन किताब (कुरान) की क़सम

आयत 3

إِنَّآ أَنزَلْنَٰهُ فِى لَيْلَةٍۢ مُّبَٰرَكَةٍ ۚ إِنَّا كُنَّا مُنذِرِينَ

Innaaa anzalnaahu fee lailatim mubaarakah; innaa kunnaa munzireen

हमने इसको मुबारक रात (शबे क़द्र) में नाज़िल किया बेशक हम (अज़ाब से) डराने वाले थे

आयत 4

فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ

Feehaa yufraqu kullu amrin hakeem

इसी रात को तमाम दुनिया के हिक़मत व मसलेहत के (साल भर के) काम फ़ैसले किये जाते हैं

आयत 5

أَمْرًۭا مِّنْ عِندِنَآ ۚ إِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ

Amram min 'indinaaa; innaa kunnaa mursileen

यानि हमारे यहाँ से हुक्म होकर (बेशक) हम ही (पैग़म्बरों के) भेजने वाले हैं

आयत 6

رَحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ

Rahmatam mir rabbik; innahoo Huwas Samee'ul 'Aleem

ये तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी है, वह बेशक बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है

आयत 7

رَبِّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ

Rabbis samaawaati wal ardi wa maa bainahumaa; in kuntum mooqineen

सारे आसमान व ज़मीन और जो कुछ इन दोनों के दरमियान है सबका मालिक

आयत 8

لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۖ رَبُّكُمْ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ

Laaa ilaaha illaa Huwa yuhyee wa yumeetu Rabbukum wa Rabbu aabaaa'ikumul awwaleen

अगर तुममें यक़ीन करने की सलाहियत है (तो करो) उसके सिवा कोई माबूद नहीं - वही जिलाता है वही मारता है तुम्हारा मालिक और तुम्हारे (अगले) बाप दादाओं का भी मालिक है

आयत 9

بَلْ هُمْ فِى شَكٍّۢ يَلْعَبُونَ

Bal hum fee shakkiny yal'aboon

लेकिन ये लोग तो शक़ में पड़े खेल रहे हैं

आयत 10

فَٱرْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِى ٱلسَّمَآءُ بِدُخَانٍۢ مُّبِينٍۢ

Fartaqib Yawma taatis samaaa'u bidukhaanim mubeen

तो तुम उस दिन का इन्तेज़ार करो कि आसमान से ज़ाहिर ब ज़ाहिर धुऑं निकलेगा

आयत 11

يَغْشَى ٱلنَّاسَ ۖ هَٰذَا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ

Yaghshan naasa haazaa 'azaabun aleem

(और) लोगों को ढाँक लेगा ये दर्दनाक अज़ाब है

आयत 12

رَّبَّنَا ٱكْشِفْ عَنَّا ٱلْعَذَابَ إِنَّا مُؤْمِنُونَ

Rabbanak shif 'annal 'azaaba innaa mu'minoon

कुफ्फ़ार भी घबराकर कहेंगे कि परवरदिगार हमसे अज़ाब को दूर दफ़ा कर दे हम भी ईमान लाते हैं

आयत 13

أَنَّىٰ لَهُمُ ٱلذِّكْرَىٰ وَقَدْ جَآءَهُمْ رَسُولٌۭ مُّبِينٌۭ

Annaa lahumuz zikraa wa qad jaaa'ahum Rasoolum mubeen

(उस वक्त) भला क्या उनको नसीहत होगी जब उनके पास पैग़म्बर आ चुके जो साफ़ साफ़ बयान कर देते थे

आयत 14

ثُمَّ تَوَلَّوْا۟ عَنْهُ وَقَالُوا۟ مُعَلَّمٌۭ مَّجْنُونٌ

Summaa tawallaw 'anhu wa qaaloo mu'allamum majnoon

इस पर भी उन लोगों ने उससे मुँह फेरा और कहने लगे ये तो (सिखाया) पढ़ाया हुआ दीवाना है

आयत 15

إِنَّا كَاشِفُوا۟ ٱلْعَذَابِ قَلِيلًا ۚ إِنَّكُمْ عَآئِدُونَ

Innaa kaashiful 'azaabi qaleelaa; innakum 'aaa'indoon

(अच्छा ख़ैर) हम थोड़े दिन के लिए अज़ाब को टाल देते हैं मगर हम जानते हैं तुम ज़रूर फिर कुफ्र करोगे

आयत 16

يَوْمَ نَبْطِشُ ٱلْبَطْشَةَ ٱلْكُبْرَىٰٓ إِنَّا مُنتَقِمُونَ

Yawma nabtishul batsha tal kubraa innaa muntaqimoon

हम बेशक (उनसे) पूरा बदला तो बस उस दिन लेगें जिस दिन सख्त पकड़ पकड़ेंगे

आयत 17

۞ وَلَقَدْ فَتَنَّا قَبْلَهُمْ قَوْمَ فِرْعَوْنَ وَجَآءَهُمْ رَسُولٌۭ كَرِيمٌ

Wa laqad fatannaa qablahum qawma Fir'awna wa jaaa'ahum Rasoolun kareem

और उनसे पहले हमने क़ौमे फिरऔन की आज़माइश की और उनके पास एक आली क़दर पैग़म्बर (मूसा) आए

आयत 18

أَنْ أَدُّوٓا۟ إِلَىَّ عِبَادَ ٱللَّهِ ۖ إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ

An addooo ilaiya 'ibaadal laahi innee lakum Rasoolun ameen

(और कहा) कि ख़ुदा के बन्दों (बनी इसराईल) को मेरे हवाले कर दो मैं (ख़ुदा की तरफ से) तुम्हारा एक अमानतदार पैग़म्बर हूँ

आयत 19

وَأَن لَّا تَعْلُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ ۖ إِنِّىٓ ءَاتِيكُم بِسُلْطَٰنٍۢ مُّبِينٍۢ

Wa al laa ta'loo 'alal laahi innee aateekum bisultaanim mubeen

और ख़ुदा के सामने सरकशी न करो मैं तुम्हारे पास वाज़ेए व रौशन दलीलें ले कर आया हूँ

आयत 20

وَإِنِّى عُذْتُ بِرَبِّى وَرَبِّكُمْ أَن تَرْجُمُونِ

Wa innee 'uztu bi Rabbee wa rabbikum an tarjumoon

और इस बात से कि तुम मुझे संगसार करो मैं अपने और तुम्हारे परवरदिगार (ख़ुदा) की पनाह मांगता हूँ

आयत 21

وَإِن لَّمْ تُؤْمِنُوا۟ لِى فَٱعْتَزِلُونِ

Wa il lam tu'minoo lee fa'taziloon

और अगर तुम मुझ पर ईमान नहीं लाए तो तुम मुझसे अलग हो जाओ

आयत 22

فَدَعَا رَبَّهُۥٓ أَنَّ هَٰٓؤُلَآءِ قَوْمٌۭ مُّجْرِمُونَ

Fada'aa rabbahooo anna haaa'ulaaa'i qawmum mujrimoon

(मगर वह सुनाने लगे) तब मूसा ने अपने परवरदिगार से दुआ की कि ये बड़े शरीर लोग हैं

आयत 23

فَأَسْرِ بِعِبَادِى لَيْلًا إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ

Fa asri bi'ibaadee lailan innakum muttaba'oon

तो ख़ुदा ने हुक्म दिया कि तुम मेरे बन्दों (बनी इसराईल) को रातों रात लेकर चले जाओ और तुम्हारा पीछा भी ज़रूर किया जाएगा

आयत 24

وَٱتْرُكِ ٱلْبَحْرَ رَهْوًا ۖ إِنَّهُمْ جُندٌۭ مُّغْرَقُونَ

Watrukil bahra rahwan innahum jundum mughraqoon

और दरिया को अपनी हालत पर ठहरा हुआ छोड़ कर (पार हो) जाओ (तुम्हारे बाद) उनका सारा लशकर डुबो दिया जाएगा

आयत 25

كَمْ تَرَكُوا۟ مِن جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ

Kam tarakoo min jannaatinw wa 'uyoon

वह लोग (ख़ुदा जाने) कितने बाग़ और चश्में और खेतियाँ

आयत 26

وَزُرُوعٍۢ وَمَقَامٍۢ كَرِيمٍۢ

Wa zuroo'inw wa maqaa min kareem

और नफीस मकानात और आराम की चीज़ें

आयत 27

وَنَعْمَةٍۢ كَانُوا۟ فِيهَا فَٰكِهِينَ

Wa na'matin kaanoo feehaa faakiheen

जिनमें वह ऐश और चैन किया करते थे छोड़ गये यूँ ही हुआ

आयत 28

كَذَٰلِكَ ۖ وَأَوْرَثْنَٰهَا قَوْمًا ءَاخَرِينَ

Kazaalika wa awrasnaahaa qawman aakhareen

और उन तमाम चीज़ों का दूसरे लोगों को मालिक बना दिया

आयत 29

فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ ٱلسَّمَآءُ وَٱلْأَرْضُ وَمَا كَانُوا۟ مُنظَرِينَ

Famaa bakat 'alaihimus samaaa'u wal ardu wa maa kaanoo munzareen

तो उन लोगों पर आसमान व ज़मीन को भी रोना न आया और न उन्हें मोहलत ही दी गयी

आयत 30

وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مِنَ ٱلْعَذَابِ ٱلْمُهِينِ

Wa laqad najjainaa Baneee Israaa'eela minal'azaabil muheen

और हमने बनी इसराईल को ज़िल्लत के अज़ाब से फिरऔन (के पन्जे) से नजात दी

आयत 31

مِن فِرْعَوْنَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَالِيًۭا مِّنَ ٱلْمُسْرِفِينَ

Min Fir'awn; innahoo kaana 'aaliyam minal musrifeen

वह बेशक सरकश और हद से बाहर निकल गया था

आयत 32

وَلَقَدِ ٱخْتَرْنَٰهُمْ عَلَىٰ عِلْمٍ عَلَى ٱلْعَٰلَمِينَ

Wa laqadikh tarnaahum 'alaa 'ilmin 'alal 'aalameen

और हमने बनी इसराईल को समझ बूझ कर सारे जहॉन से बरगुज़ीदा किया था

आयत 33

وَءَاتَيْنَٰهُم مِّنَ ٱلْءَايَٰتِ مَا فِيهِ بَلَٰٓؤٌۭا۟ مُّبِينٌ

Wa aatainaahum minal aayaati maa feehi balaaa'um mubeen

और हमने उनको ऐसी निशानियाँ दी थीं जिनमें (उनकी) सरीही आज़माइश थी

आयत 34

إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ لَيَقُولُونَ

Inna haaa'ulaaa'i la yaqooloon

ये (कुफ्फ़ारे मक्का) (मुसलमानों से) कहते हैं

आयत 35

إِنْ هِىَ إِلَّا مَوْتَتُنَا ٱلْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُنشَرِينَ

In hiya illaa mawtatunal oolaa wa maa nahnu bimun shareen

कि हमें तो सिर्फ एक बार मरना है और फिर हम दोबारा (ज़िन्दा करके) उठाए न जाएँगे

आयत 36

فَأْتُوا۟ بِـَٔابَآئِنَآ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ

Faatoo bi aabaaa'inaaa inkuntum saadiqeen

तो अगर तुम सच्चे हो तो हमारे बाप दादाओं को (ज़िन्दा करके) ले आओ

आयत 37

أَهُمْ خَيْرٌ أَمْ قَوْمُ تُبَّعٍۢ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ أَهْلَكْنَٰهُمْ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ مُجْرِمِينَ

Ahum khayrun am qawmu Tubba'inw wallazeena min qablihim; ahlaknaahum innahum kaanoo mujrimeen

भला ये लोग (क़ूवत में) अच्छे हैं या तुब्बा की क़ौम और वह लोग जो उनसे पहले हो चुके हमने उन सबको हलाक कर दिया (क्योंकि) वह ज़रूर गुनाहगार थे

आयत 38

وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَٰعِبِينَ

Wa maa khalaqnas samaawaati wal arda wa maa baina humaa laa'ibeen

और हमने सारे आसमान व ज़मीन और जो चीज़े उन दोनों के दरमियान में हैं उनको खेलते हुए नहीं बनाया

आयत 39

مَا خَلَقْنَٰهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

Maa khalaqnaahumaaa illaa bilhaqqi wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon

इन दोनों को हमने बस ठीक (मसलहत से) पैदा किया मगर उनमें के बहुतेरे लोग नहीं जानते

आयत 40

إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ مِيقَٰتُهُمْ أَجْمَعِينَ

Inna yawmal fasli meeqaatuhum ajma'een

बेशक फ़ैसला (क़यामत) का दिन उन सब (के दोबार ज़िन्दा होने) का मुक़र्रर वक्त है

आयत 41

يَوْمَ لَا يُغْنِى مَوْلًى عَن مَّوْلًۭى شَيْـًۭٔا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ

Yawma laa yughnee mawlan 'am mawlan shai'anw wa laa hum yunsaroon

जिस दिन कोई दोस्त किसी दोस्त के कुछ काम न आएगा और न उन की मदद की जाएगी

आयत 42

إِلَّا مَن رَّحِمَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

Illaa mar rahimal laah' innahoo huwal 'azeezur raheem

मगर जिन पर ख़ुदा रहम फरमाए बेशक वह (ख़ुदा) सब पर ग़ालिब बड़ा रहम करने वाला है

आयत 43

إِنَّ شَجَرَتَ ٱلزَّقُّومِ

Inna shajarataz zaqqoom

(आख़ेरत में) थोहड़ का दरख्त

आयत 44

طَعَامُ ٱلْأَثِيمِ

Ta'aamul aseem

ज़रूर गुनेहगार का खाना होगा

आयत 45

كَٱلْمُهْلِ يَغْلِى فِى ٱلْبُطُونِ

Kalmuhli yaghlee filbutoon

जैसे पिघला हुआ तांबा वह पेटों में इस तरह उबाल खाएगा

आयत 46

كَغَلْىِ ٱلْحَمِيمِ

Kaghalyil hameem

जैसे खौलता हुआ पानी उबाल खाता है

आयत 47

خُذُوهُ فَٱعْتِلُوهُ إِلَىٰ سَوَآءِ ٱلْجَحِيمِ

Khuzoohu fa'tiloohu ilaa sawaaa'il Jaheem

(फरिश्तों को हुक्म होगा) इसको पकड़ो और घसीटते हुए दोज़ख़ के बीचों बीच में ले जाओ

आयत 48

ثُمَّ صُبُّوا۟ فَوْقَ رَأْسِهِۦ مِنْ عَذَابِ ٱلْحَمِيمِ

Summa subboo fawqa raasihee min 'azaabil hameem

फिर उसके सर पर खौलते हुए पानी का अज़ाब डालो फिर उससे ताआनन कहा जाएगा अब मज़ा चखो

आयत 49

ذُقْ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْكَرِيمُ

Zuq innaka antal 'azeezul kareem

बेशक तू तो बड़ा इज्ज़त वाला सरदार है

आयत 50

إِنَّ هَٰذَا مَا كُنتُم بِهِۦ تَمْتَرُونَ

Inna haazaa maa kuntum bihee tamtaroon

ये वही दोज़ख़ तो है जिसमें तुम लोग शक़ किया करते थे

आयत 51

إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى مَقَامٍ أَمِينٍۢ

Innal muttaqeena fee maqaamin ameen

बेशक परहेज़गार लोग अमन की जगह

आयत 52

فِى جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ

Fee jannaatinw wa 'uyoon

(यानि) बाग़ों और चश्मों में होंगे

आयत 53

يَلْبَسُونَ مِن سُندُسٍۢ وَإِسْتَبْرَقٍۢ مُّتَقَٰبِلِينَ

Yalbasoona min sundusinw wa istbraqim mutaqaabileen

रेशम की कभी बारीक़ और कभी दबीज़ पोशाकें पहने हुए एक दूसरे के आमने सामने बैठे होंगे

आयत 54

كَذَٰلِكَ وَزَوَّجْنَٰهُم بِحُورٍ عِينٍۢ

Kazaalika wa zawwajnaahum bihoorin 'een

ऐसा ही होगा और हम बड़ी बड़ी ऑंखों वाली हूरों से उनके जोड़े लगा देंगे

आयत 55

يَدْعُونَ فِيهَا بِكُلِّ فَٰكِهَةٍ ءَامِنِينَ

Yad'oona feehaa bikulli faakihatin aamineen

वहाँ इत्मेनान से हर किस्म के मेवे मंगवा कर खायेंगे

आयत 56

لَا يَذُوقُونَ فِيهَا ٱلْمَوْتَ إِلَّا ٱلْمَوْتَةَ ٱلْأُولَىٰ ۖ وَوَقَىٰهُمْ عَذَابَ ٱلْجَحِيمِ

Laa yazooqoona feehal mawtaa illal mawtatal oolaa wa qaqaahum 'azaabal jaheem

वहाँ पहली दफ़ा की मौत के सिवा उनको मौत की तलख़ी चख़नी ही न पड़ेगी और ख़ुदा उनको दोज़ख़ के अज़ाब से महफूज़ रखेगा

आयत 57

فَضْلًۭا مِّن رَّبِّكَ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ

Fadlam mir rabbik; zaalika huwal fawzul 'azeem

(ये) तुम्हारे परवरदिगार का फज़ल है यही तो बड़ी कामयाबी है

आयत 58

فَإِنَّمَا يَسَّرْنَٰهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ

Fa innamaa yassarnaahu bilisaanika la'allahum yatazakkaroon

तो हमने इस क़ुरान को तुम्हारी ज़बान में (इसलिए) आसान कर दिया है ताकि ये लोग नसीहत पकड़ें तो

आयत 59

فَٱرْتَقِبْ إِنَّهُم مُّرْتَقِبُونَ

Fartaqib innahum murta qiboon

(नतीजे के) तुम भी मुन्तज़िर रहो ये लोग भी मुन्तज़िर हैं