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सोने से पहले के अज़कार

सुबह और शाम · 13 दुआएँ

सोने से पहले के अज़कार 0:00
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1 AI

يَجْمَعُ كَفَّيْهِ ثُمَّ يَنْفُثُ فِيهِمَا فَيَقْرَأُ فِيهِمَا: بسم الله الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ ﴿قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ * اللَّهُ الصَّمَدُ* لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ* وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُواً أَحَدٌ﴾. بسم الله الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ* مِن شَرِّ مَا خَلَقَ* وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ* وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ* وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ﴾. بسم الله الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ* مَلِكِ النَّاسِ* إِلَهِ النَّاسِ* مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ* الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ* مِنَ الْجِنَّةِ وَ النَّاسِ﴾ ثُمَّ يَمْسَحُ بِهِمَا مَا اسْتَطَاعَ مِنْ جَسَدِهِ يَبْدَأُ بِهِمَا عَلَى رَأْسِهِ وَوَجْهِهِ وَمَا أَقبَلَ مِنْ جَسَدِهِ

(सोने से पहले) आप अपनी दोनों हथेलियाँ मिलाते, उनमें फूँक मारते और उनमें सूरह इख़्लास, सूरह फ़लक़ और सूरह नास पढ़ते, फिर जहाँ तक हो सके उनसे अपने शरीर पर मसह करते, सिर, चेहरे और शरीर के अगले हिस्से से आरंभ करते। (हर रात तीन बार)

स्रोत: Al-Bukhari, Muslim 4/ 1723.

2

اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلاَّ بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلاَ يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلاَّ بِمَا شَاء وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ وَلاَ يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ

ख़ुदा ही वो ज़ाते पाक है कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं (वह) ज़िन्दा है (और) सारे जहान का संभालने वाला है उसको न ऊँघ आती है न नींद जो कुछ आसमानो में है और जो कुछ ज़मीन में है (गरज़ सब कुछ) उसी का है कौन ऐसा है जो बग़ैर उसकी इजाज़त के उसके पास किसी की सिफ़ारिश करे जो कुछ उनके सामने मौजूद है (वह) और जो कुछ उनके पीछे (हो चुका) है (खुदा सबको) जानता है और लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ पर भी अहाता नहीं कर सकते मगर वह जिसे जितना चाहे (सिखा दे) उसकी कुर्सी सब आसमानॊं और ज़मीनों को घेरे हुये है और उन दोनों (आसमान व ज़मीन) की निगेहदाश्त उसपर कुछ भी मुश्किल नहीं और वह आलीशान बुजुर्ग़ मरतबा है

स्रोत: Al-Baqarah 2:255, Al-Bukhari.

3

آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلآئِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لاَ نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِ وَقَالُواْ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ* لاَ يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْساً إِلاَّ وُسْعَهَا لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنَا لاَ تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا رَبَّنَا وَلاَ تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْراً كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا رَبَّنَا وَلاَ تُحَمِّلْنَا مَا لاَ طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَآ أَنتَ مَوْلاَنَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

हमारे पैग़म्बर (मोहम्मद) जो कुछ उनपर उनके परवरदिगार की तरफ से नाज़िल किया गया है उस पर ईमान लाए और उनके (साथ) मोमिनीन भी (सबके) सब ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान लाए (और कहते हैं कि) हम ख़ुदा के पैग़म्बरों में से किसी में तफ़रक़ा नहीं करते और कहने लगे ऐ हमारे परवरदिगार हमने (तेरा इरशाद) सुना और मान लिया परवरदिगार हमें तेरी ही मग़फ़िरत की (ख्वाहिश है) और तेरी ही तरफ़ लौट कर जाना है ख़ुदा किसी को उसकी ताक़त से ज्यादा तकलीफ़ नहीं देता उसने अच्छा काम किया तो अपने नफ़े के लिए और बुरा काम किया तो (उसका वबाल) उसी पर पडेग़ा ऐ हमारे परवरदिगार अगर हम भूल जाऐं या ग़लती करें तो हमारी गिरफ्त न कर ऐ हमारे परवरदिगार हम पर वैसा बोझ न डाल जैसा हमसे अगले लोगों पर बोझा डाला था, और ऐ हमारे परवरदिगार इतना बोझ जिसके उठाने की हमें ताक़त न हो हमसे न उठवा और हमारे कुसूरों से दरगुज़र कर और हमारे गुनाहों को बख्श दे और हम पर रहम फ़रमा तू ही हमारा मालिक है तू ही काफ़िरों के मुक़ाबले में हमारी मदद कर

स्रोत: Al-Baqarah 2:285-6, Al-Bukhari, Muslim 1/554.

4 AI

بِاسْمِكَ رَبِّي وَضَعْتُ جَنْبِي, وَبِكَ أَرْفَعُهُ, فَإِن أَمْسَكْتَ نَفْسِي فارْحَمْهَا, وَإِنْ أَرْسَلْتَهَا فَاحْفَظْهَا, بِمَا تَحْفَظُ بِهِ عِبَادَكَ الصَّالِحِينَ

ऐ मेरे रब! तेरे नाम से मैंने अपना पहलू ज़मीन पर रखा और तेरी मदद से इसे उठाऊँगा। यदि तू मेरी जान रोक ले तो उस पर रहम कर, और यदि छोड़ दे तो उसकी रक्षा कर जैसे तू अपने नेक बंदों की रक्षा करता है।

स्रोत: Al-Bukhari 11/126, Muslim 4/2084.

5 AI

اللَّهُمَّ إِنَّكَ خَلَقْتَ نَفْسِي وَأَنْتَ تَوَفَّاهَا, لَكَ مَمَاتُهَا وَمَحْياهَا, إِنْ أَحْيَيْتَهَا فَاحْفَظْهَا, وَإِنْ أَمَتَّهَا فَاغْفِرْ لَهَا. اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ العَافِيَةَ

ऐ अल्लाह! निस्संदेह तूने मेरी जान को पैदा किया और तू ही उसे मृत्यु देकर ले लेगा; उसकी मृत्यु और जीवन तेरे ही अधिकार में है। यदि तू उसे जीवित रखे तो उसकी रक्षा कर, और यदि मृत्यु दे तो उसे क्षमा कर। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे आफ़ियत माँगता हूँ।

स्रोत: Muslim 4/2083, Ahmad 2/79.

6 AI

اللَّهُمَّ قِنِي عَذَابَكَ يَوْمَ تَبْعَثُ عِبَادَكَ

ऐ अल्लाह! जिस दिन तू अपने बंदों को दोबारा उठाएगा, उस दिन मुझे अपने अज़ाब से बचा।

स्रोत: Abu Dawud 4/311, Sahih At-Tirmizi 3/143.

7 AI

بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ أَمُوتُ وَأَحْيَا

ऐ अल्लाह! तेरे ही नाम से मैं मरता हूँ और जीता हूँ।

स्रोत: Al-Bukhari, Muslim 4/2083.

8 AI

سُبْحَانَ اللَّهِ (ثلاثاً وثلاثين) و الْحَمْدُ لِلَّهِ (ثلاثاً وثلاثين) وَ اللَّهُ أَكْبَر (أربعاً وثلاثين)

सुबहानल्लाह (तैंतीस बार), अल्हम्दुलिल्लाह (तैंतीस बार) और अल्लाहु अकबर (चौंतीस बार)।

स्रोत: Al-Bukhari, Muslim 4/2091.

9 AI

اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ وَرَبَّ الأَرْضِ, وَرَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ, رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَيْءٍ, فَالِقَ الْحَبِّ وَالنَّوَى, وَمُنْزِلَ التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ, وَالْفُرْقَانِ, أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَيْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ. اللَّهُمَّ أَنْتَ الأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيْءٌ, وَأَنْتَ الآخِرُ فَلَيسَ بَعْدَكَ شَيْءٌ, وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَيْءٌ, وَأَنْتَ الْبَاطِنُ فَلَيْسَ دُونَكَ شَيْءٌ, اقْضِ عَنَّا الدَّيْنَ وَأَغْنِنَا مِنَ الْفَقْرِ

ऐ अल्लाह! सातों आसमानों के रब और ज़मीन के रब, महान अर्श के रब, हमारे रब और हर चीज़ के रब; दाने और गुठली को फाड़ने वाले; तौरात, इंजील और फ़ुरक़ान (क़ुरआन) को उतारने वाले! मैं हर उस चीज़ के शर से तेरी पनाह माँगता हूँ जिसका नियंत्रण तेरे हाथ में है। ऐ अल्लाह! तू ही पहला है, तुझसे पहले कुछ नहीं; तू ही अंतिम है, तेरे बाद कुछ नहीं; तू ही ज़ाहिर है, तुझसे ऊपर कुछ नहीं; तू ही बातिन है, तुझसे क़रीब कुछ नहीं। हमारा क़र्ज़ अदा कर दे और हमें ग़रीबी से बेनियाज़ कर दे।

स्रोत: Muslim 4/2084.

10 AI

الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنَا وَسَقَانَا, وَكَفَانَا, وَآوَانَا, فَكَمْ مِمَّنْ لاَ كَافِيَ لَهُ وَلاَ مُؤْوِيَ

सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें खिलाया और पिलाया, हमारे लिए काफ़ी हुआ और हमें ठिकाना दिया; कितने ही लोग हैं जिनके लिए न कोई काफ़ी होने वाला है और न कोई ठिकाना देने वाला!

स्रोत: Muslim 4/2085.

11

اللَّهُمَّ عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ, رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ, أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ, أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي, وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطانِ وَشِرْكِهِ, وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءاً, أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ

ऐ अल्लाह! ऐ ग़ैब तथा ह़ाज़िर को जानने वाले! आस्मानों और ज़मीन को पैदा करने वाले! हर चीज़ के पालनहार औऱ मालिक! मैं गवाही देता हूं कि तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। मैं तेरी पनाह मांगता हूं अपने नफ़्स के शर से, शैतान के शर से, उसके शिर्क से और इस बात से कि मैं अपनी जान पर कोई बुराई करूं या किसी और मुसलमान के लिए बुराई का कारण बनूं।) (1) ............................... (1) तिर्मिज़ी हदीस संख्याः3392, अबू-दाऊद हदीस संख्याः5067, देखिएः सह़ीह़ तिर्मिज़ीः3/142

स्रोत: Abu Dawud 4/317, Sahih At-Tirmizi 3/142.

12 AI

يَقْرَأُ ﴿الم﴾ تَنْزِيلَ السَّجْدَةِ, وَ(تَبَارَكَ الَّذي بِيَدِهِ الْمُلْكُ)

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सोने से पहले सूरह सजदा (अलिफ़-लाम-मीम, तंज़ील) और सूरह मुल्क (तबारकल्लज़ी बियदिहिल मुल्क) पढ़ा करते थे।

स्रोत: At-Tirmizi, An-Nasa'i, Sahih al-Jami' as-Saghir 4/255.

13 AI

اللَّهُمَّ أَسْلَمْتُ نَفْسِي إِلَيْكَ, وَفَوَّضْتُ أَمْرِي إِلَيْكَ, وَوَجَّهْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ, وَأَلْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَيْكَ, رَغْبَةً وَرَهْبَةً إِلَيْكَ, لاَ مَلْجَأَ وَلاَ مَنْجَا مِنْكَ إِلاَّ إِلَيْكَ, آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي أَنْزَلْتَ, وَبِنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ

ऐ अल्लाह! मैंने स्वयं को तेरे हवाले कर दिया, अपना मामला तुझे सौंप दिया, अपना चेहरा तेरी ओर कर लिया और अपनी पीठ तेरे सहारे टिका दी, तेरी ओर रग़बत और तेरे ही भय से। तुझसे बचने के लिए तेरे सिवा न कोई पनाह है और न कोई छुटकारा। मैं तेरी उस किताब पर ईमान लाया जो तूने उतारी, और तेरे उस नबी पर जिसे तूने भेजा।

स्रोत: Al-Bukhari, Muslim 4/2081.

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