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Noor / दुआ / सुबह और शाम / शाम के अज़कार

शाम के अज़कार

सुबह और शाम · 21 दुआएँ

1

اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلاَّ بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلاَ يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلاَّ بِمَا شَاء وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضَ وَلاَ يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ

ख़ुदा ही वो ज़ाते पाक है कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं (वह) ज़िन्दा है (और) सारे जहान का संभालने वाला है उसको न ऊँघ आती है न नींद जो कुछ आसमानो में है और जो कुछ ज़मीन में है (गरज़ सब कुछ) उसी का है कौन ऐसा है जो बग़ैर उसकी इजाज़त के उसके पास किसी की सिफ़ारिश करे जो कुछ उनके सामने मौजूद है (वह) और जो कुछ उनके पीछे (हो चुका) है (खुदा सबको) जानता है और लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ पर भी अहाता नहीं कर सकते मगर वह जिसे जितना चाहे (सिखा दे) उसकी कुर्सी सब आसमानॊं और ज़मीनों को घेरे हुये है और उन दोनों (आसमान व ज़मीन) की निगेहदाश्त उसपर कुछ भी मुश्किल नहीं और वह आलीशान बुजुर्ग़ मरतबा है

स्रोत: Al-Hakim 1 / 562, Sahih at-Targhib wa at-Tarhib 1/273, at-Tabarani.

2

بسم الله الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ ﴿قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ* اللَّهُ الصَّمَدُ* لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ* وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُواً أَحَدٌ﴾. بسم الله الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ* مِن شَرِّ مَا خَلَقَ* وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ* وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ* وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ﴾. بسم الله الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ* مَلِكِ النَّاسِ* إِلَهِ النَّاسِ* مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ* الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ* مِنَ الْجِنَّةِ وَ النَّاسِ﴾ (ثلاث مرات )

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा एक है ख़ुदा बरहक़ बेनियाज़ है न उसने किसी को जना न उसको किसी ने जना, और उसका कोई हमसर नहीं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक की हर चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की पनाह माँगता हूँ और अंधेरीरात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा जाए और गन्डों पर फूँकने वालियों की बुराई से (जब फूँके) और हसद करने वाले की बुराई से (ऐ रसूल) तुम कह दो मैं लोगों के परवरदिगार लोगों के बादशाह लोगों के माबूद की (शैतानी) वसवसे की बुराई से पनाह माँगता हूँ जो (ख़ुदा के नाम से) पीछे हट जाता है जो लोगों के दिलों में वसवसे डाला करता है जिन्नात में से ख्वाह आदमियों में से

स्रोत: Al-Ikhlas:1-4. Al-Falaq:1-5. An-Nas:1-6, Abu Dawud 4/322, At-Tirmizi 5/567, Sahih At-Tirmizi 3/182.

3 AI

أَمسينَا وَأَمسى الْمُلْكُ لِلَّهِ, وَالْحَمْدُ لِلَّهِ, لاَ إِلَهَ إلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ, لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ, رَبِّ أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا فِي هَذَه الْليلة وَخَيرَ مَا بَعْدَها, وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِي هَذَه الْليلة وَشَرِّ مَا بَعْدَها, رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَسُوءِ الْكِبَرِ, رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابٍ فِي النَّارِ وَعَذَابٍ فِي الْقَبْرِ

हमने शाम की और सारी बादशाही अल्लाह के लिए हो कर शाम हुई; सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है। अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं; उसी की बादशाही है और उसी के लिए सब प्रशंसा है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। ऐ मेरे रब! मैं तुझसे इस रात की भलाई और इसके बाद की भलाई माँगता हूँ, और इस रात के शर और इसके बाद के शर से तेरी पनाह माँगता हूँ। ऐ मेरे रब! मैं आलस्य और बुढ़ापे की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ। ऐ मेरे रब! मैं आग के अज़ाब और क़ब्र के अज़ाब से तेरी पनाह माँगता हूँ।

स्रोत: Muslim 4/2088.

4

اللَّهُمَّ بِكَ أَمسينا, وَبِكَ أَصبحنا, وَبِكَ نَحْيَا, وَبِكَ نَمُوتُ وَإِلَيْكَ المصيرُ

ऐ अल्लाह! तेरे ही नाम से हमने सुबह़ की और तेरे ही नाम से हमने शाम की (1), तेरे ही नाम से हम ज़िन्दा हैं और तेरा ही नाम लेते हुए हम मरेंगे और तेरी ही ओर लौट कर जाना है।) (2) ........................................... (1) और जब शाम के वक्त पढ़े तो ये कहेः ऐ अल्लाह, तेरे ही नाम से हमने शाम की और तेरे ही नाम से हमने सुबह़ की, तेरे ही नाम से हम ज़िन्दा हैं और तेरा ही नाम लेते हुए हम मरेंगे और तेरी ही ओर लौट कर जाना है। (2) तिर्मिज़ीः5/466, हदीस संख्याः3391, देखिएः सह़ीह़ तिर्मिजीः3/142

स्रोत: Sahih At-Tirmizi 3/142.

5

اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ, خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ, وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ, أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ, أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ, وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ

ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तूने मुझे पैदा किया, मैं तेरा बन्दा हूं और मैं अपनी ताक़त-भर तेरे वादे पर क़ायम हूं। मैंने जो कुछ किया, उसके शर (बुराई) से तेरी पनाह चाहता हूं। अपने ऊपर तेरी नेमत का इक़रार (1) करता हूं और अपने गुनाहें का इक़रार करता हूं। अतः मुझे बख़्श दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई दूसरा गुनाहों को नही बख़्श सकता।) (2) ............................ (1) स्वीकार करता हूं। (2) जो आदमी इस दुआ पर यक़ीन रखते हुए शाम को पढ़े और उसी रात उसकी मृत्यु हो जाए तो वो जन्नत में प्रवेश करेगा और ऐसे ही अगर यह दुआ सुबह़ को पढ़े और उसी दिन मर जाए तो जन्नत में प्रवेश करेगा। बुख़ारीः7/150, हदीस संख्याः6306

स्रोत: Al-Bukhari 7/150, An-Nasa'i, At-Tirmizi.

6 AI

اللَّهُمَّ إِنِّي أَمسيتُ أُشْهِدُكَ, وَأُشْهِدُ حَمَلَةَ عَرْشِكَ, وَمَلاَئِكَتَكَ, وَجَمِيعَ خَلْقِكَ, أَنَّكَ أَنْتَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ, وَأَنَّ مُحَمَّداً عَبْدُكَ وَرَسُولُكَ (أربع مرات)

ऐ अल्लाह! मैंने इस हाल में शाम की कि मैं तुझे, तेरे अर्श को उठाने वालों को, तेरे फ़रिश्तों को और तेरी समस्त सृष्टि को गवाह बनाता हूँ कि तू ही अल्लाह है, तेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं, और यह कि मुहम्मद तेरे बंदे और तेरे रसूल हैं। (चार बार)

स्रोत: Abu Dawud 4/317, An-Nasa'i, Ibn As-Sunni.

7 AI

اللَّهُمَّ مَا أَمسى بِي مِنْ نِعْمَةٍ أَوْ بِأَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَمِنْكَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ, فَلَكَ الْحَمْدُ وَلَكَ الشُّكْرُ

ऐ अल्लाह! इस शाम जो भी नेमत मुझे या तेरी सृष्टि में से किसी को प्राप्त है, वह केवल तेरी ओर से है, तेरा कोई साझी नहीं; अतः सब प्रशंसा तेरे ही लिए है और सब शुक्र तेरे ही लिए है।

स्रोत: Abu Dawud 4/318, Ibn As-Sunni (Hadith no. 41), Ibn Hibban (Hadith no. 2361).

8

اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَدَنِي, اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي سَمْعِي, اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَصَرِي, لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ. اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكُفْرِ, وَالفَقْرِ, وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ, لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ (ثلاث مرات)

ऐ अल्लाह! मुझे मेरे बदन में आफ़ियत दे। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे कानों में आफ़ियत दे। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी आंखों में आफ़ियत दे। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। ऐ अल्लाह! मैं कुफ़्र और फ़क़्र (ग़रीबी) से तेरी पनाह चाहता हूं और क़ब्र के अ़ज़ाब से तेरी पनाह चाहता हूं। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।) (तीन बार) (1) ............................................ (1) अबू दाऊदः 4/324, हदीस संख्याः5092, नसाई की अ़मलुल-यौमे वल-लैला,हदीस संख्याः22, इब्नुस्-सुन्नी, हदीस संख्याः69, बुख़ारी की अल-अदबुल-मुफ़रद, हदीस संख्याः701, शैख़ इब्ने बाज़ ने इसकी सनद को तोह़फतुल-अख़्यार पृष्ठ संख्याः26 में ह़सन कहा है।

स्रोत: Abu Dawud 4/324, Ahmad 5/42, An-Nasa'i, Ibn As-Sunni (Hadith no. 69), Ibn Hibban (Hadith no. 2361).

9

حَسْبِيَ اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ عَلَيهِ تَوَكَّلتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ (سبع مرات)

मुझे अल्लाह ही काफी है। उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, मैंंने उसी पर भरोसा किया और वह अ़र्शे अ़ज़ीम का रब है।) (सात बार) (1) ..................................... (1) जो आदमी इस दुआ को सात बार सुबह़ और सात बार शाम को पढ़ेगा, अल्लाह उसके दुनिया औऱ आख़िरत के कामों के लिए काफ़ी होगा। नसाई की अ़मलुल-यौमे वल-लैला,हदीस संख्याः22, इसे इब्नुस्-सुन्नी (हदीस संख्याः69) ने मर्फ़ू और अबू दाऊद ( 4/324, हदीस संख्याः5092) ने मौक़ूफ़ तौर पर रिवायत कियी है।और शोऐब एवं अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने इसकी सनद को सह़ीह़ कहा है। देखिएः ज़ादुल- मआदः2/376

स्रोत: Ibn As-Sunni (no. 71), Abu Dawud 4/321, Ibn As-Sunni.

10

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ, اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ: فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأَهْلِي, وَمَالِي, اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي, وَآمِنْ رَوْعَاتِي, اللَّهُمَّ احْفَظْنِي مِنْ بَينِ يَدَيَّ, وَمِنْ خَلْفِي, وَعَنْ يَمِينِي, وَعَنْ شِمَالِي, وَمِنْ فَوْقِي, وَأَعُوذُ بِعَظَمَتِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِنْ تَحْتِي

ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया औऱ आख़िरत में माफ़ी और आफ़ियत का सवाल करता हूं। ऐ अल्लाह! मैं अपने दीन, अपनी दुनिया, अपने ख़ानदान और अपने माल में तुझसे माफ़ी और आफ़ियत का सवाल करता हूं। ऐ अल्लाह! मेरी परदे वाली चीज़ पर परदा डाल दे और मेरी घबराहटों को सुकून में बदल दे। ऐ अल्लाह! मेरे सामने से, मेरे पीछे से, मेरे दाएं से, मेरे बाएं से और मेरे ऊपर से मेरी ह़िफ़ाज़त कर और इस बात से मैं तेरी अ़ज़मत की पनाह चाहता हूं कि अचानक अपने नीचे से हलाक किया जाऊं।) (1) .................................. (1) अबू दाऊद, हदीस संख्याः5074, इब्ने माजा, हदीस संख्याः3871, देखिएः सह़ीह़ इब्ने माजाः2/332

स्रोत: Sahih Ibn Majah 2/332, Abu Dawud.

11

اللَّهُمَّ عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ, رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ, أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ, أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي, وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطانِ وَشَرَكِهِ, وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءاً, أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ

ऐ अल्लाह! ऐ ग़ैब तथा ह़ाज़िर को जानने वाले! आस्मानों और ज़मीन को पैदा करने वाले! हर चीज़ के पालनहार औऱ मालिक! मैं गवाही देता हूं कि तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। मैं तेरी पनाह मांगता हूं अपने नफ़्स के शर से, शैतान के शर से, उसके शिर्क से और इस बात से कि मैं अपनी जान पर कोई बुराई करूं या किसी और मुसलमान के लिए बुराई का कारण बनूं।) (1) ............................... (1) तिर्मिज़ी हदीस संख्याः3392, अबू-दाऊद हदीस संख्याः5067, देखिएः सह़ीह़ तिर्मिज़ीः3/142

स्रोत: Sahih At-Tirmizi 3/142, Abu Dawud.

12

بِسْمِ اللَّهِ الَّذِي لاَ يَضُرُّ مَعَ اسْمِهِ شَيْءٌ فِي الْأَرْضِ وَلاَ فِي السّمَاءِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (ثلاث مرات)

अल्लाह के नाम के साथ, जिसके नाम के साथ ज़मीन और आस्मान में कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुंचाती और वही सुनने वाला और जानने वाला है।) (तीन बार) (1) ................................ (1) जो व्यक्ती इस दुआ को तीन बार सुबह़ के समय एवं तीन बार शाम के समय पढ़ेगा, उसे कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। अबू-दाऊदः 4/323,हदीस संख्याः5088, तिर्मिज़ीः5/465, हदीस संख्याः3388, इब्ने माजा हदीस संख्याः3869, अह़मद, हदीस संख्याः446, देखिएः सह़ीह इब्ने माजाः2/332, शैख़ इब्ने बाज़ ने इसकी सनद को तोह़फतुल-अख़्यार पृष्ठ संख्याः39 में ह़सन कहा है।

स्रोत: Abu Dawud 4/323, At-Tirmizi 5/465, Ibn Majah 2/332, Ahmad.

13

رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبَّاً, وَبِالْإِسْلاَمِ دِيناً, وَبِمُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم نَبِيّاً (ثلاث مرات )

मैं अल्लाह के रब होने पर, इस्लाम के दीन होने पर और मुह़म्मद के सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी होने पर राज़ी हूं।) (तीन बार) (1) ................................ (1) जो आदमी इस दुआ को तीन बार सुबह़ और तीन बार शाम को पढ़ेगा, अल्लाह तआला उसे क़यामत के दिन ज़रूर ख़ुश कर देगा। अह़मदः4/337, हदीस संख्याः18967, नसाई की अ़मलुल-यौमे वल-लैला,हदीस संख्याः4, इब्नुस्-सुन्नी, हदीस संख्याः68, अबू दाऊदः 4/318, हदीस संख्याः1531, तिर्मिज़ीः5/465,हदीस संख्याः3389, शैख़ इब्ने बाज़ ने इसकी सनद को तोह़फतुल-अख़्यार पृष्ठ संख्याः39 में ह़सन कहा है।

स्रोत: Ahmad 4/ 337, An-Nasa'i, Ibn As-Sunni (no. 68), At-Tirmizi 5/465.

14

يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ بِرَحْمَتِكَ أَسْتَغيثُ أَصْلِحْ لِي شَأْنِيَ كُلَّهُ وَلاَ تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ

ऐ जिन्दा रहने वाले! ऐ क़ायम रहने वाले! मैं तेरी ही रह़मत से फरयाद करता हूं, तू मेरे तमाम काम दुरुस्त कर दे और आंख झपकने के बरार भी मुझे मेरे नफ़्स के ह़वाले न कर।) (1) ..................................... (1) ह़ाकीम ने इसे रिवायत करके सह़ीह़ कहा है और ज़हबी ने सहमति व्यक्त की है, 1/545, देखिएः सह़ीह़ुत्-तरग़ीब वत्-तरहीबः1/273

स्रोत: Al-Hakim 1/545.

15

أَمسينَا وَأَمسى الْمُلْكُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ, اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ هَذَه الْليلة:فَتْحَها, وَنَصْرَها, وَنورَها, وَبَرَكَتَها, وَهُدَاها, وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِيها وَشَرِّ مَا بَعْدَها

हमने सूबह़ की और अल्लाह रब्बुल-आलमीन के मुल्क ने सुबह़ की (1)। सब तारीफ़ अल्लाह के लिए है। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस दिन (2) की भलाई, इसकी फ़त्ह़ व मदद, इसका नूर, इसकी बरकत और इसकी हिदायत का सवाल करता हूं तथा इस दिन की बुराई एवं इसके बाद वाले दिनों की बुराई से तेरी पनाह मांगता हूं।) (3) ..................................... (1) और जब शाम के वक्त पढ़े तो ये कहेः हमने शाम की और अल्लाह रब्बुल आलमीन के मुल्क ने शाम की। (2) और जब शाम के वक्त पढ़े तो ये कहेः ऐ बल्लाह मैं तुझसे इस रात की भलाई, इसकी फ़त्ह़ व मदद, इसका नूर, इसकी बरकत और इसकी हिदायत का सवाल करता हूं और इस रात की बुराई तथा इसके बाद वाली रातों की बुराई से तेरी पनाह मांगता हूं। (3) अबू दाऊदः4/322, ह़दीस संख्याः5084, और शैख शेऐब और अ़ब्दुर क़ादिर अरनाऊत ने इसकी सनद को ह़सन कहा है। तह़कीक़ ज़ादुल-मआदः2/373

स्रोत: Abu Dawud 4/322.

16 AI

أَمسينا عَلَى فِطْرَةِ الْإِسْلاَمِ, وَعَلَى كَلِمَةِ الْإِخْلاَصِ, وَعَلَى دِينِ نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم, وَعَلَى مِلَّةِ أَبِينَا إِبْرَاهِيمَ, حَنِيفاً مُسْلِماً وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشرِكِينَ

हमने इस्लाम की फ़ितरत पर, इख़्लास के कलिमे पर, अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दीन पर और अपने पिता इब्राहीम की मिल्लत पर शाम की; वे एकनिष्ठ आज्ञाकारी मुसलमान थे और मुश्रिकों में से न थे।

स्रोत: Ahmad 3/406-7, 5/123, An-Nasa'i, At-Tirmizi 4/209.

17

سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ (مائة مرة)

मैं अल्लाह की पाकी बयान करता हूं औऱ उसकी तारीफ़ करता हूं।) (सौ बार) (1) ........................ (1) जो आदमी सुबह़ एवं शाम इस दुआ को सौ बार पढ़ेगा, क़यामत के दिन कोई आदमी उससे बेहतर अ़मल लेकर नहीं आएगा, हां अगर कोई आदमी उसी के बराबर या उससे अधिक बार इस दुआ को पढ़े, (तो उससे बेहतर हो सकता है।) मुस्लिमः4/2071, हदीस संख्याः2692

स्रोत: Muslim 4/2071.

18

لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ, لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ, وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (عشر مرات أو مرة واحدة عند الكسل)

अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। वह अकेला है। उसका कोई शरीक नहीं। बादशाही उसी की है। उसी के लिए सब तारीफ़ है। वह मारता और जिलाता है और वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है।) (दस बार) (1), अथवा (सुस्ती के समय एक ही बार) (2) .............................. (1) नसाई की अमलुल-यौमे वल-लैला हदीस संख्याः24, देखिए सह़ीह़ुत-तरग़ीब वत-तरहीबः1/272 और शैख इब्ने बाज़ की तोह़फ़तुल-अख़्यार पृष्ठ संख्याः44,इसकी फ़ज़ीलत के लिए देखिए पृष्ठ संख्याः146, हदीस संख्याः255 (2) अबू दाऊद, हदीस संख्याः5077, इब्ने माजा हदीस संख्याः3798, अह़मद, हदीस संख्याः8719 देखिएः सह़ीह़ुत्-तरग़ीब वत-तरहीब(1/270, सह़ीह़ अबू दाऊद3/957, सह़ीह़ इब्ने माजाः2/331, ज़ादुल मआदः2/377

स्रोत: An-Nasa'i, Abu Dawud 4/319, Ibn Majah, Ahmad 4/60.

19

أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ (مائة مرة في اليوم)

मैं अल्लाह से माफी मांगता हूं और उसी से तौबा करता हूं।) (दिन में सौ बार) (1) ................................. (1) बुखारी फ़त्ह़ुल-बारी के साथः11/101, हदीस संख्याः6307, मुस्लिमः4/2075, हदीस संख्याः2702

स्रोत: Al-Bukhari, Muslim 4/2075.

20

أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ (ثلاث مرات)

मैं अल्लाह के पूर्ण शब्दों के साथ उन तमाम चीज़ों की बुराई से पनाह चाहता हूं जो उसने पैदी की हैं।) (शाम के समय तीन बार पढ़े।) (1) ............................... (1) जो आदमी शाम के समय इस दुआ को पढ़ेगा, उसे उस रात कोई ज़हरीला जानवर नुक़्सान नहीं पहुंचएगा। अह़मदः2/290, ह़दीस संख्याः7898,नसाई की अमलुल-यौमे वल-लैला हदीस संख्याः590, इब्नुस्-सुन्नी, ह़दीस संख्याः68, देखिएः सह़ीह़ तिर्मिज़ीः3/187, सह़ीह़ इब्ने माजाः2/266 और शौख़ इब्ने बाज़ की तोह़प़फ़तुल- अख़्यार पृष्ठ संख़्याः45

स्रोत: Ahmad 2/ 290, An-Nasa'i, At-Tirmizi 3/187, Ibn As-Sunni (Hadith no. 68), Ibn Majah 2/266.

21

اللَّهُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ عَلَى نَبَيِّنَا مُحَمَّدٍ (عشر مرات)

ऐ अल्लाह! हमारे नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद व सलान भेज।) (दस बार) (1) ................................ (1) (जो आदमी दस बार सुबह़ को और दस बार शाम को मुझ पर दरूद पढ़ेगा, उसे क़यामत के दिन मेरी शफ़ाअत नसीब होगी।) तबरानी ने इस ह़दीस को दो सनदों से रिवायत किया है, जिन में से एक जैयिद है। देखिएः मजमउज़-ज़वाइदः10/120 और सह़ीह़ुत-तरग़ीब वत-तरहीबः1/273

स्रोत: At-Tabrani, Sahih at-Targhib wa at-Tarhib 1/273.

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